औरत / कैफ़ी आज़मी

AURAT, WOMAN, औरत (कैफ़ी आज़मी, Aurat by Kaifi Azmi
AURAT, WOMAN

ये छंद उर्दू कविता औरत (महिला) के हैं, जो भारत के प्रसिद्ध उर्दू कवि कैफ़ी आज़मी द्वारा लिखी गई हैं। उल्लेखनीय बात यह है कि कैफी ने यह कविता भारत की स्वतंत्रता से पहले 1940 के दशक में लिखी थी। उस युग में जब भारतीय समाज बहुत ही पारंपरिक था और बहुत अधिक एक व्यक्ति दुनिया थी, ऐसे विचार लगभग अनसुने थे। लेकिन तब कैफ़ी हमेशा अपने समय से दशकों आगे थे।

औरत

 

उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

कल्ब-ए-माहौल में लरज़ाँ शरर-ए-ज़ंग हैं आज

हौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक रंग हैं आज

आबगीनों में तपां वलवला-ए-संग हैं आज

हुस्न और इश्क हम आवाज़ व हमआहंग हैं आज




जिसमें जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझे

उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे




ज़िन्दगी जहद में है सब्र के काबू में नहीं

नब्ज़-ए-हस्ती का लहू कांपते आँसू में नहीं

उड़ने खुलने में है नक़्हत ख़म-ए-गेसू में नहीं

ज़न्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहीं

उसकी आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे

उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे




क़द्र अब तक तिरी तारीख़ ने जानी ही नहीं

तुझ में शोले भी हैं बस अश्कफ़िशानी ही नहीं

तू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं

तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं

अपनी तारीख़ का उनवान बदलना है तुझे

उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे




गोशे-गोशे में सुलगती है चिता तेरे लिये

फ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा तेरे लिये

क़हर है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिये

ज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिये

रुत बदल डाल अगर फूलना फलना है तुझे

उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे




तोड़ कर रस्म के बुत बन्द-ए-क़दामत से निकल

ज़ोफ़-ए-इशरत से निकल वहम-ए-नज़ाकत से निकल

नफ़स के खींचे हुये हल्क़ा-ए-अज़मत से निकल

क़ैद बन जाये मुहब्बत तो मुहब्बत से निकल

राह का ख़ार ही क्या गुल भी कुचलना है तुझे

उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे




तोड़ ये अज़्म शिकन दग़दग़ा-ए-पन्द भी तोड़

तेरी ख़ातिर है जो ज़ंजीर वह सौगंध भी तोड़

तौक़ यह भी है ज़मर्रूद का गुल बन्द भी तोड़

तोड़ पैमाना-ए-मरदान-ए-ख़िरदमन्द भी तोड़

बन के तूफ़ान छलकना है उबलना है तुझे

उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे




तू फ़लातून व अरस्तू है तू ज़ोहरा परवीन

तेरे क़ब्ज़े में ग़रदूँ तेरी ठोकर में ज़मीं

हाँ उठा जल्द उठा पा-ए-मुक़द्दर से ज़बीं

मैं भी रुकने का नहीं वक़्त भी रुकने का नहीं

लड़खड़ाएगी कहाँ तक कि संभलना है तुझे

उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

 

Kaifi Azmi 






 

Aurat




uth merii jaan mere saath hii chalnaa hai tujhe

qalb-e-mahoul mein larzaan sharar-e-jang hain aaj

hausley waqt ke aur ziist ke yakrang hain aaj

aabgiinon mein tapaan walwale-e- sang hain aaj

husn aur ishq ham aawaaz-o-humaahang hain aaj

jis mein jaltaa huun usi aag mein jalnaa hai tujhe

uth merii jaan mere saath hii chalnaa hai tujhe

zindagii jehad mein hai sabr ke qaabuu mein nahiin

nabz-e-hastii kaa lahuu kaamptii aansuu mein nahii

urne khulne mein hai nakhat kham-e-gesu mein nahiin

jannat aik aur hai jo mard ke pahluu mein nahiin

uskii aazaad ravish par bhii machalnaa hai tujhe

uth merii jaan mere saath hii chalnaa hai tujhe



qadr ab tak terii tarriikh ne jaanii hii nahiin

tujh mein shole bhii hain bas ashkfishaanii hii nahiin

tu haqiiqat bhii hai dilchasp kahaanii hii nahiin

terii hastii bhii hai ik chiiz javaanii hii nahiin

apnii tarrikh kaa unvaan badalnaa hai tujhe

uth merii jaan mere saath hii chalnaa hai tujhe



goshey goshey mein sulagtii hai chitaa tere liye

farz kaa bhes badaltii hai qazaa tere liye

qahar hai terii har narm adaa tere liye

zahar hii zahar hai duniyaa kii havaa tere liye

rut badal daal agar phuulnaa phalnaa hai tujhe

uth merii jaan mere saath hii chalnaa hai tujhe



tod kar rasm ke but bare qadamat se nikal

zof-e-ishrat se nikal, vaham-e-nazaakat se nikal

nafs ke khiinche hue halq-e-azmal se nikal

yeh bhii ek qaid hii hai, qaid-e-muhabbat se nikal

raah kaa khaar hii kyaa gul bhii kuchalnaa hai tujhe

uth merii jaan mere saath hii chalnaa hai tujhe



tod yeh azm-shikan dagdag-e-pand bhii tor

terii khaatir hai jo zanjiir vah saugandh bhii tor

tauq yeh bhii zammruud kaa gulband bhii tor

tod paimana-e-mardaan-e-khirdmand bhii tor

banke tuufaan chhalaknaa hai ubalnaa hai tujhe

uth merii jaan mere saath hii chalnaa hai tujhe

tuu falaatuno-arastuu haii tuu zohraa parviin

tere qabze mein hai garduun, terii thokar mein zamiin

haan, uthaa, jald uthaa paae-muqqadar se jabiin

main bhii rukne kaa nahii waqt bhii rukne kaa nahiin

larkharaayegii kahaan tak ki sambhalnaa hai tujhe

uth merii jaan mere saath hii chalnaa hai tujhe

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